लखनऊ में कैब से चार रेलवे कर्मचारियों को उतारना पड़ा महंगा, रैपिडो ने अंकित कुमार को 99 साल 11 महीने के लिए किया सस्पेंड
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से कैब सर्विस से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सोशल मीडिया से लेकर आम लोगों तक बहस छेड़ दी है। एक कैब ड्राइवर ने अपनी गाड़ी में बैठे चार रेलवे कर्मचारियों को रास्ते में उतार दिया। ड्राइवर का आरोप है कि चारों यात्री बार-बार जातिसूचक और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल कर रहे थे। उसने कई बार उन्हें ऐसा बोलने से मना किया, लेकिन जब कथित तौर पर वे नहीं माने तो उसने गाड़ी रोककर उन्हें नीचे उतरने को कह दिया।
मामला सामने आने के बाद कैब ड्राइवर अंकित कुमार का रैपिडो अकाउंट 99 साल 11 महीने के लिए सस्पेंड कर दिया गया। सामने आई जानकारी के मुताबिक, कंपनी की ओर से कार्रवाई के पीछे अभद्र भाषा, गाली-गलौज और अपशब्दों के इस्तेमाल का कारण बताया गया। दूसरी ओर अंकित का कहना है कि कंपनी ने उसकी बात सुने बिना कार्रवाई कर दी।
चार रेलवे कर्मचारियों को कैब से उतारा
बताया जा रहा है कि घटना लखनऊ के तेलीबाग इलाके से जुड़ी है। अंकित कुमार के अनुसार, उन्होंने रेलवे स्टेशन से चार लोगों को कैब में बैठाया था। ये चारों भारतीय रेलवे से जुड़े कर्मचारी बताए जा रहे हैं। यात्रा के दौरान वे किसी वरिष्ठ अधिकारी को लेकर बातचीत कर रहे थे।
अंकित का आरोप है कि बातचीत के दौरान चारों यात्री बार-बार जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर रहे थे। ड्राइवर ने कथित तौर पर उन्हें ऐसा बोलने से रोकने की कोशिश की। उसका कहना है कि उसने समझाया कि किसी व्यक्ति की योग्यता या क्षमता का संबंध उसकी जाति से नहीं होना चाहिए।
अंकित के मुताबिक, इसके बावजूद बातचीत में कथित जातिसूचक भाषा बंद नहीं हुई। इसके बाद उसने गाड़ी रोक दी और चारों यात्रियों को कैब से उतरने के लिए कहा। यात्रियों के उतरने के बाद मामला बहस तक पहुंच गया। आसपास के लोगों की भी भीड़ जमा होने की बात सामने आई है।
अंकित का दावा- ‘बार-बार जातिसूचक शब्द बोल रहे थे’
इस पूरे विवाद में सबसे अहम पक्ष खुद कैब ड्राइवर अंकित कुमार का है। उसका कहना है कि उसने यात्रियों को किसी निजी विवाद के कारण नहीं उतारा था। उसने आरोप लगाया कि यात्रियों की बातचीत में लगातार जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल हो रहा था और वह इससे असहज था।
अंकित का कहना है कि उसने कई बार विरोध किया, लेकिन यात्री कथित तौर पर नहीं माने। इसके बाद उसने अपनी कैब रोककर उन्हें नीचे उतरने के लिए कहा।
अंकित ने सोशल मीडिया पर जारी वीडियो में भी अपनी बात रखी। उसके मुताबिक, घटना का वीडियो सामने आने के बाद उसे सोशल मीडिया पर गाली-गलौज और धमकी भरे संदेश भी मिल रहे हैं। उसने लोगों से अपील की कि पूरे मामले को एकतरफा तरीके से देखने के बजाय उसकी बात भी सुनी जाए।
रैपिडो ने 99 साल 11 महीने के लिए किया सस्पेंड
विवाद के बाद मामला रैपिडो तक पहुंचा। इसके बाद अंकित के अकाउंट पर कंपनी की ओर से कार्रवाई की गई। अंकित ने दावा किया कि उसका अकाउंट 99 साल 11 महीने के लिए सस्पेंड कर दिया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, सस्पेंशन की अवधि इतनी लंबी है कि इसे व्यवहारिक तौर पर स्थायी प्रतिबंध के बराबर माना जा सकता है। सामने आई जानकारी में सस्पेंशन की अंतिम तारीख 19 जुलाई 2126 बताई गई है। कार्रवाई के कारण में गाली-गलौज, दोहरे अर्थ वाली बातचीत और अपशब्दों के इस्तेमाल का उल्लेख
यही बात इस पूरे मामले को और ज्यादा चर्चा में ले आई है। आम तौर पर किसी कर्मचारी या ड्राइवर के खिलाफ कुछ समय के लिए कार्रवाई की बात सामने आती है, लेकिन करीब एक सदी का सस्पेंशन लोगों के लिए चौंकाने वाला है।
ड्राइवर का आरोप- ‘मेरी बात सुनी ही नहीं गई’
अंकित का कहना है कि कंपनी ने कार्रवाई करने से पहले उसका पक्ष ठीक से नहीं सुना। उसका दावा है कि उसने यात्रियों को क्यों उतारा, इसकी वजह बताने का मौका उसे नहीं मिला।
उसके लिए यह सिर्फ एक कैब अकाउंट का मामला नहीं है, बल्कि रोजी-रोटी से जुड़ा सवाल भी है। रिपोर्ट के अनुसार अंकित मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा होल्डर हैं और परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए कैब चलाते हैं। ऐसे में लंबे समय का सस्पेंशन उसके रोजगार पर सीधा असर डाल सकता है।
अंकित का कहना है कि उसने किसी यात्री के साथ गलत व्यवहार करने के उद्देश्य से ऐसा नहीं किया। उसका दावा है कि उसने केवल कथित जातिसूचक भाषा का विरोध किया था।
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ मामला
घटना से जुड़ा वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद मामला तेजी से लोगों की नजर में आया। वीडियो में ड्राइवर और यात्रियों के बीच विवाद की स्थिति दिखाई देने की बात सामने आई है। इसके बाद सोशल मीडिया पर लोग अलग-अलग राय रखने लगे।
कुछ लोग अंकित के समर्थन में दिखाई दिए और उनका कहना है कि यदि कोई यात्री वास्तव में जातिसूचक या अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल कर रहा था तो ड्राइवर को उसका विरोध करने का अधिकार होना चाहिए। वहीं कुछ लोगों का सवाल है कि यात्री को बीच रास्ते उतारने से पहले कंपनी की गाइडलाइन और सुरक्षा व्यवस्था का ध्यान रखा जाना चाहिए था।
इस मामले में सबसे जरूरी बात यह है कि आरोपों की पुष्टि जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही हो सकती है। अभी सामने आई खबरों में यात्रियों का विस्तृत पक्ष स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए किसी भी पक्ष को अंतिम रूप से दोषी ठहराने से पहले पूरी घटना की जांच जरूरी है।
जातिसूचक टिप्पणी को लेकर गंभीर सवाल
इस घटना ने एक बार फिर सार्वजनिक स्थानों और रोजमर्रा की सेवाओं में जातिगत टिप्पणी और अपमानजनक भाषा के सवाल को सामने ला दिया है। कैब जैसी सेवा में ड्राइवर और यात्री कुछ समय तक एक ही वाहन में रहते हैं। ऐसे में दोनों पक्षों से सम्मानजनक व्यवहार की उम्मीद की जाती है।
यदि किसी यात्री द्वारा वास्तव में जातिसूचक टिप्पणी की जाती है तो यह गंभीर सामाजिक और कानूनी सवाल खड़ा कर सकता है। दूसरी ओर, किसी ड्राइवर के लिए भी विवाद को बढ़ाने के बजाय सुरक्षित और उचित तरीके से शिकायत दर्ज कराने का रास्ता महत्वपूर्ण होता है।
यही वजह है कि ऐसे मामलों में प्लेटफॉर्म कंपनियों की भूमिका भी अहम हो जाती है। उन्हें शिकायत मिलने पर दोनों पक्षों की बात सुनकर उपलब्ध वीडियो, ऑडियो, चैट या अन्य साक्ष्यों की जांच करनी चाहिए, ताकि कार्रवाई निष्पक्ष तरीके से हो सके।
करीब 100 साल का सस्पेंशन क्यों चर्चा में है?
अंकित के मामले में सबसे ज्यादा चर्चा 99 साल 11 महीने के सस्पेंशन की हो रही है। व्यवहारिक रूप से इतनी लंबी अवधि किसी व्यक्ति के लिए लगभग स्थायी प्रतिबंध जैसी है।
किसी प्लेटफॉर्म के पास अपने नियमों के तहत अकाउंट को निलंबित या बंद करने की शर्तें हो सकती हैं। लेकिन जब कार्रवाई किसी व्यक्ति की आजीविका से जुड़ती है तो प्रक्रिया और पारदर्शिता का सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
इस मामले में यह भी देखा जाना बाकी है कि कंपनी ने ड्राइवर की शिकायत या उसके स्पष्टीकरण को किस तरह लिया और क्या दोनों पक्षों से जानकारी जुटाने के बाद अंतिम निर्णय किया गया।
कंपनी और ड्राइवर दोनों के लिए बड़ा सबक
यह पूरा मामला कैब कंपनियों, ड्राइवरों और यात्रियों—तीनों के लिए एक महत्वपूर्ण सबक भी सामने रखता है। यात्रियों को ड्राइवर के साथ सम्मानजनक भाषा में बात करनी चाहिए और किसी भी तरह की जातिगत, धार्मिक या व्यक्तिगत टिप्पणी से बचना चाहिए।
इसी तरह ड्राइवरों को भी किसी विवाद की स्थिति में शांत रहकर कंपनी के सपोर्ट सिस्टम या पुलिस की मदद लेनी चाहिए। अगर कोई यात्री अभद्र व्यवहार कर रहा है तो घटना का रिकॉर्ड, उपलब्ध साक्ष्य और शिकायत की प्रक्रिया बाद में मामले को स्पष्ट करने में मदद कर सकती है।
कैब कंपनियों के लिए भी यह जरूरी है कि विवादित मामलों में कार्रवाई से पहले तथ्यों की जांच हो और दोनों पक्षों को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर मिले।
अब आगे क्या होगा?
लखनऊ का यह मामला अभी सोशल मीडिया और सार्वजनिक चर्चा में है। अंकित कुमार का कहना है कि उसने जातिसूचक भाषा के विरोध में यात्रियों को कैब से उतारा था, जबकि कंपनी की कार्रवाई उसके खिलाफ शिकायत और प्लेटफॉर्म नियमों के उल्लंघन से जुड़ी बताई जा रही है। कंपनी की ओर से इस पूरे विवाद पर विस्तृत आधिकारिक पक्ष सामने आने पर स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।
फिलहाल इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर विवाद की शुरुआत किस बात से हुई और क्या वास्तव में यात्रियों ने जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया था। इसका जवाब निष्पक्ष जांच और उपलब्ध साक्ष्यों से ही सामने आ सकता है।
एक तरफ अंकित के लिए करीब 100 साल का सस्पेंशन उसकी रोजी-रोटी पर बड़ा असर डाल सकता है, वहीं दूसरी तरफ यह मामला कैब सेवाओं में यात्रियों और ड्राइवरों के बीच सम्मानजनक व्यवहार की जरूरत को भी उजागर करता है। 16 मिनट के किसी ऑफर या सामान्य कैब विवाद की तरह यह मामला केवल सोशल मीडिया की बहस तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सम्मान, रोजगार, प्लेटफॉर्म नियम और जातिगत भेदभाव जैसे कई गंभीर सवाल जुड़े हुए हैं।














