उन्नाव में गंगा एक्सप्रेसवे की सड़क में दरार, हजारों करोड़ की परियोजना पर उठे सवाल
उत्तर प्रदेश के उन्नाव से गंगा एक्सप्रेसवे को लेकर एक ऐसा वीडियो सामने आया है, जिसने नई सड़क की गुणवत्ता और रखरखाव को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। वीडियो में एक्सप्रेसवे की सड़क के एक हिस्से में दरार दिखाई दे रही है। तस्वीरें सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर इतनी बड़ी और नई परियोजना की सड़क पर इतनी जल्दी दरार कैसे आ गई।
गंगा एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश की सबसे महत्वाकांक्षी सड़क परियोजनाओं में शामिल है। मेरठ से प्रयागराज तक करीब 594 किलोमीटर लंबे इस छह लेन एक्सेस-कंट्रोल्ड एक्सप्रेसवे को करीब 36,230 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किया गया है। इसे भविष्य में आठ लेन तक विस्तारित करने योग्य बनाया गया है। यह एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश के 12 जिलों से होकर गुजरता है, जिनमें उन्नाव भी शामिल है।
अब उन्नाव में सड़क पर दिखाई दे रही दरार को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह केवल सतही नुकसान है या इसके पीछे सड़क की आधारभूत संरचना से जुड़ी कोई बड़ी समस्या है।
29 अप्रैल को प्रधानमंत्री मोदी ने किया था लोकार्पण
गंगा एक्सप्रेसवे का लोकार्पण 29 अप्रैल 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरदोई में किया था। परियोजना के शुरू होने के बाद इसे उत्तर प्रदेश के परिवहन ढांचे में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा गया। आधिकारिक जानकारी के अनुसार यह 594 किलोमीटर लंबा छह लेन का एक्सेस-कंट्रोल्ड ग्रीनफील्ड हाई-स्पीड कॉरिडोर है।
इतनी बड़ी परियोजना के शुरू होने के कुछ ही समय बाद इसके किसी हिस्से में सड़क की सतह पर दरार दिखाई देना इसलिए भी चर्चा का विषय बन गया है क्योंकि एक्सप्रेसवे से लोगों को लंबे समय तक सुरक्षित और बेहतर सफर की उम्मीद है।
हालांकि, सिर्फ वीडियो में दरार दिखाई देने से यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि पूरे एक्सप्रेसवे की निर्माण गुणवत्ता खराब है। दरार की वास्तविक वजह जानने के लिए संबंधित हिस्से की तकनीकी जांच जरूरी होगी।
36 हजार करोड़ रुपये की परियोजना पर सवाल
गंगा एक्सप्रेसवे पर लगभग 36,230 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। इतनी बड़ी लागत वाली सड़क परियोजना में निर्माण की गुणवत्ता, जल निकासी, सड़क की परतों और रखरखाव की व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण होती है।
सड़क की ऊपरी सतह पर दिखाई देने वाली दरार कई कारणों से हो सकती है। बारिश के कारण जमीन में नमी, जल निकासी की समस्या, नीचे की मिट्टी का बैठना, सड़क की विभिन्न परतों में दबाव या किसी स्थानीय निर्माण संबंधी समस्या को संभावित कारणों के रूप में जांचा जा सकता है।
लेकिन इनमें से कौन-सा कारण वास्तव में उन्नाव वाले हिस्से में लागू होता है, इसका फैसला विशेषज्ञों की जांच के बाद ही किया जा सकता है।
अडानी समूह की भूमिका कितनी है?
इस परियोजना को लेकर सोशल मीडिया पर यह दावा भी किया जा रहा है कि गंगा एक्सप्रेसवे में अडानी की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत है। इस दावे को सही संदर्भ में समझना जरूरी है।
अडानी समूह की कंपनियां गंगा एक्सप्रेसवे के कई हिस्सों से जुड़ी हैं। अडानी की आधिकारिक जानकारी के अनुसार कंपनी की सहायक कंपनियों के पास परियोजना के कुछ हिस्सों के विकास, संचालन और रखरखाव से जुड़े कंसेशन एग्रीमेंट हैं। उदाहरण के लिए, अडानी की एक सहायक कंपनी उन्नाव से प्रयागराज वाले करीब 156.847 किलोमीटर के ग्रुप-IV हिस्से से जुड़ी है।
अडानी समूह की आधिकारिक जानकारी यह भी बताती है कि कंपनी गंगा एक्सप्रेसवे परियोजना में शामिल रही है और 594 किलोमीटर के एक्सप्रेसवे को अप्रैल 2026 में ऑपरेशनल किया गया।
इसलिए खबर में इसे सीधे “अडानी की 80 प्रतिशत हिस्सेदारी” कहना भ्रामक हो सकता है। 80 प्रतिशत का दावा किस आधार पर किया गया है, यह स्पष्ट किए बिना इसे कंपनी की स्वामित्व हिस्सेदारी मानना सही नहीं होगा।
सड़क में दरार की असली वजह क्या हो सकती है?
एक्सप्रेसवे की सड़क कई परतों से मिलकर तैयार होती है। सबसे नीचे जमीन की तैयारी की जाती है, उसके ऊपर अलग-अलग आधार परतें और फिर सड़क की सतह बनाई जाती है। सड़क की मजबूती केवल ऊपर दिखाई देने वाली काली सतह पर निर्भर नहीं करती।
अगर नीचे की मिट्टी पर्याप्त रूप से मजबूत नहीं है या उसमें पानी जमा हो जाता है, तो ऊपर की सड़क पर दबाव पड़ सकता है। भारी वाहनों की आवाजाही से यह समस्या आगे बढ़ सकती है।
इसी तरह सड़क के किनारे पानी की निकासी की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होती है। बारिश का पानी यदि सही तरीके से बाहर नहीं निकलता तो वह सड़क की संरचना को प्रभावित कर सकता है।
हालांकि उन्नाव में सामने आई दरार का कारण अभी आधिकारिक तौर पर सामने नहीं आया है। इसलिए किसी एक वजह को जिम्मेदार बताना जल्दबाजी होगी।
मानसून में होगी सड़क की बड़ी परीक्षा
नई सड़क परियोजनाओं के लिए मानसून का मौसम बेहद महत्वपूर्ण होता है। बारिश के दौरान सड़क की जल निकासी, मिट्टी की मजबूती और निर्माण की गुणवत्ता की वास्तविक परीक्षा होती है।
गंगा एक्सप्रेसवे जैसे लंबे कॉरिडोर में अलग-अलग इलाकों की मिट्टी और जलवायु भी अलग हो सकती है। इसलिए किसी एक स्थान पर आई समस्या का कारण दूसरे स्थान से अलग हो सकता है।
अगर उन्नाव में दरार के आसपास पानी जमा हुआ है या सड़क के किनारे मिट्टी में कटाव दिखाई देता है, तो विशेषज्ञों को इन पहलुओं की भी जांच करनी होगी।
क्या दरार सिर्फ ऊपर तक सीमित है?
यह सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी सवाल है।
अगर दरार केवल सड़क की ऊपरी सतह पर है, तो संभव है कि मरम्मत से समस्या दूर हो जाए। लेकिन अगर दरार नीचे की परतों तक पहुंच गई है या सड़क का बेस कमजोर हुआ है, तो केवल ऊपर से डामर डालकर मरम्मत करना पर्याप्त नहीं होगा।
तकनीकी टीम सड़क की सतह और नीचे की परतों की जांच करके यह पता लगा सकती है कि समस्या कितनी गहरी है। जरूरत पड़ने पर सड़क के प्रभावित हिस्से से नमूने लिए जा सकते हैं और सामग्री की गुणवत्ता तथा परतों की मजबूती की जांच की जा सकती है।
यही जांच बताएगी कि मामला सामान्य रखरखाव का है या निर्माण संबंधी किसी गंभीर कमी का।
तेज रफ्तार वाहनों के लिए चिंता की बात
एक्सप्रेसवे पर वाहन सामान्य सड़कों की तुलना में ज्यादा गति से चलते हैं। इसलिए सड़क की सतह पर अचानक आई दरार या धंसाव सुरक्षा के लिहाज से गंभीर हो सकता है।
अगर दरार छोटी है और सड़क की संरचना पर उसका असर नहीं है, तो भी संबंधित विभाग को उसकी निगरानी करनी चाहिए। अगर दरार बढ़ रही है, सड़क धंस रही है या आसपास की मिट्टी में बदलाव दिखाई दे रहा है, तो तत्काल सुरक्षा उपाय जरूरी हो जाते हैं।
प्रभावित स्थान पर चेतावनी संकेत और जरूरत पड़ने पर गति कम करने के इंतजाम किए जा सकते हैं, ताकि किसी संभावित दुर्घटना को रोका जा सके।
लोगों को चाहिए स्पष्ट जवाब
गंगा एक्सप्रेसवे पर बड़ी रकम खर्च की गई है और यह राज्य के महत्वपूर्ण परिवहन नेटवर्क का हिस्सा है। इसलिए सड़क पर सामने आई दरार को लेकर लोगों को स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए।
संबंधित विभाग को यह बताना चाहिए कि दरार किस स्थान पर आई है, उसका आकार कितना है, क्या सड़क के नीचे की संरचना सुरक्षित है और इसकी मरम्मत के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
अगर जांच में निर्माण संबंधी कमी सामने आती है तो जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। अगर कारण बारिश, जल निकासी या जमीन के बैठने से जुड़ा है, तो भविष्य में ऐसी समस्या रोकने के लिए आवश्यक तकनीकी सुधार किए जाने चाहिए।
सोशल मीडिया के दावों से सावधानी जरूरी
इस मामले में सोशल मीडिया पर कई तरह के दावे सामने आ सकते हैं। लेकिन सड़क की एक तस्वीर या वीडियो देखकर पूरे एक्सप्रेसवे की गुणवत्ता पर अंतिम फैसला देना सही नहीं होगा।
इसी तरह किसी कंपनी पर सीधे लापरवाही का आरोप लगाने से पहले यह पता लगाना जरूरी है कि प्रभावित सड़क का संबंधित पैकेज किस एजेंसी या कंपनी के जिम्मे है और उस हिस्से के निर्माण तथा रखरखाव की जिम्मेदारी किसके पास है।
अडानी समूह की कंपनियां गंगा एक्सप्रेसवे के कई हिस्सों से जुड़ी हैं, लेकिन पूरी परियोजना की 80 प्रतिशत “स्वामित्व हिस्सेदारी” का दावा उपलब्ध आधिकारिक जानकारी से सीधे साबित नहीं होता।
अब जांच से साफ होगी तस्वीर
उन्नाव में गंगा एक्सप्रेसवे की सड़क पर दिखाई दे रही दरार ने निश्चित तौर पर सवाल खड़े किए हैं। करीब 36,230 करोड़ रुपये की लागत, 594 किलोमीटर लंबाई और हाल ही में हुए लोकार्पण के कारण इस मामले की गंभीरता और बढ़ जाती है।
लेकिन असली कहानी दरार की तस्वीर से नहीं, बल्कि तकनीकी जांच से सामने आएगी। अगर यह केवल सतही दरार है तो उसे समय रहते ठीक किया जा सकता है। अगर नीचे की परतों में समस्या है तो व्यापक मरम्मत की जरूरत होगी।
गंगा एक्सप्रेसवे से लाखों यात्रियों की उम्मीदें जुड़ी हैं। इसलिए सड़क की गुणवत्ता और सुरक्षा को लेकर किसी भी शिकायत को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। संबंधित एजेंसियों की जिम्मेदारी है कि वे प्रभावित हिस्से की जांच कराकर स्थिति स्पष्ट करें और जरूरत पड़ने पर तत्काल सुधार करें।
फिलहाल उन्नाव से सामने आई सड़क की दरार ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया है—क्या हजारों करोड़ रुपये की इस नई परियोजना में आई यह दरार केवल सतही समस्या है, या इसके पीछे सड़क की संरचना से जुड़ी कोई बड़ी वजह छिपी है? इसका जवाब अब तकनीकी जांच और आधिकारिक रिपोर्ट से ही सामने आएगा।













