रायबरेली में सावन का महीना अब पहले जैसा नहीं रहा। एक समय में जहां पेड़ों पर झूले नजर आते थे, वहां अब सन्नाटा पसरा है। सावन में महिलाओं और युवतियों के झूलने की परंपरा अब इतिहास बन गई है। गांवों में पहले सावन का महीना आते ही उत्सव का माहौल बन जाता था। महिलाएं नई चूड़ियां पहनतीं और बालों में फूल सजाकर झूलों पर बैठतीं। गीतों की गूंज से पूरा वातावरण सजीव हो उठता था।

आधुनिक जीवनशैली ने इस परंपरा को धीरे-धीरे समाप्त कर दिया है। पेड़ों की जगह कंक्रीट की इमारतें खड़ी हो गई हैं। मेले के स्थान पर शॉपिंग मॉल आ गए हैं। नई पीढ़ी मोबाइल फोन में व्यस्त रहती है।
यह बदलाव सिर्फ एक परंपरा का खत्म होना नहीं है। यह प्रकृति से मनुष्य के दूर होने का संकेत है। सावन के झूले समाज में प्रेम और एकता का प्रतीक थे। इन झूलों के माध्यम से लोग एक-दूसरे से जुड़ते थे।

खेतों की मेड़ें और पीपल की डालियां अब सूनी पड़ी हैं। सावन का त्योहार अब कैलेंडर में एक तारीख भर रह गया है। भारतीय लोक जीवन की विशेषता थी प्रकृति से जुड़ाव, जो अब टूटता जा रहा है।













