हस्तशिल्प की जीवंत परंपरा से रूबरू हुए दतिमा के विद्यार्थी, तीन दिवसीय कार्यक्रम संपन्न
सूरजपुर। छत्तीसगढ़ की समृद्ध और सदियों पुरानी हस्तशिल्प परंपरा से दतिमा के विद्यार्थियों को रूबरू कराने के उद्देश्य से आयोजित तीन दिवसीय हस्तशिल्प प्रदर्शन-सह-जागरूकता कार्यक्रम संपन्न हो गया। कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों को प्रदेश की पारंपरिक कला, शिल्प निर्माण की तकनीक और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की आवश्यकता के बारे में जानकारी दी गई।
यह आयोजन देवी अहिल्या बाई पब्लिक स्कूल, दतिमा परिसर में वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार के कार्यालय विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) के अंतर्गत संचालित हस्तशिल्प सेवा केन्द्र, जगदलपुर की ओर से किया गया।
कार्यक्रम का नेतृत्व सहायक निदेशक मनोज राठी ने किया। आयोजन को सफल बनाने में विद्यालय के निदेशक मुकेश अग्रवाल और राजू यादव तथा प्राचार्य संजीत कुमार सिंह की सक्रिय भूमिका रही।
चार प्रमुख पारंपरिक कलाओं का हुआ प्रदर्शन
तीन दिनों तक चले इस कार्यक्रम में विद्यार्थियों के सामने राज्य की चार प्रमुख हस्तकलाओं का सजीव प्रदर्शन किया गया। इनमें गोदना पेंटिंग, भित्तिचित्र, काष्ठ शिल्प और ड्राई फ्लावर पेंटिंग शामिल रहीं।
हस्तशिल्पियों ने विद्यार्थियों को केवल तैयार कलाकृतियां ही नहीं दिखाईं, बल्कि इन कलाओं की उत्पत्ति, उनसे जुड़ी लोक परंपराओं और उनके निर्माण की बारीक प्रक्रिया के बारे में भी जानकारी दी।

कारीगरों ने बताया कि पारंपरिक हस्तशिल्प केवल कला का माध्यम नहीं है, बल्कि यह प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान और पीढ़ियों से चली आ रही लोक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
विद्यार्थियों ने कारीगरों से सीधे सीखी तकनीक
कार्यक्रम में सरगुजा, बिलासपुर और जशपुर सहित विभिन्न क्षेत्रों से आए अनुभवी हस्तशिल्पियों ने अपने पारंपरिक कौशल का प्रदर्शन किया। विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक इन गतिविधियों में भाग लिया और कारीगरों से सीधे संवाद कर शिल्प निर्माण की तकनीकी जानकारी प्राप्त की।
विद्यार्थियों ने यह समझने का प्रयास किया कि अलग-अलग प्राकृतिक और स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके पारंपरिक कलाकृतियों को किस प्रकार तैयार किया जाता है। प्रदर्शन के दौरान बच्चों में खासा उत्साह देखने को मिला।
पुस्तकीय ज्ञान के साथ मिला व्यावहारिक अनुभव
इस कार्यक्रम की खास बात यह रही कि विद्यालय की नियमित शैक्षणिक गतिविधियों के साथ हस्तशिल्प जागरूकता कार्यक्रम भी समानांतर रूप से संचालित किया गया। इससे विद्यार्थियों को किताबों में पढ़ी जाने वाली सांस्कृतिक विरासत को प्रत्यक्ष रूप से देखने और समझने का अवसर मिला।
कार्यक्रम के माध्यम से विद्यार्थियों को यह संदेश भी दिया गया कि पारंपरिक कला और हस्तशिल्प को संरक्षित करना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। नई पीढ़ी यदि इन कलाओं को समझे और इनके प्रति रुचि विकसित करे, तो प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है।

तीन दिवसीय आयोजन के समापन पर विद्यार्थियों और विद्यालय प्रबंधन ने कार्यक्रम को उपयोगी और ज्ञानवर्धक बताया। आयोजन ने शिक्षा और पारंपरिक शिल्प विरासत के बीच एक बेहतर समन्वय स्थापित किया, जिससे विद्यार्थियों को एक यादगार और व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हुआ।
रिपोर्ट: शिवम तिवारी, भारत टीवी, सूरजपुर













