IMPCL के निजीकरण का विरोध: कर्मचारियों का आंदोलन तेज, आयुष मंत्रालय की लाभकारी कंपनी को बेचने पर उठे सवाल
अल्मोड़ा, उत्तराखंड। देश की प्रतिष्ठित सरकारी आयुर्वेदिक औषधि निर्माण कंपनी इंडियन मेडिसिन फार्मास्युटिकल कॉरपोरेशन लिमिटेड (IMPCL) को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। कर्मचारियों और विभिन्न सामाजिक संगठनों का आरोप है कि केंद्र सरकार ने आयुष मंत्रालय के अधीन संचालित इस लाभकारी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम को मात्र 121 करोड़ रुपये में एक निजी कंपनी को बेचने का फैसला किया है। इस निर्णय के विरोध में IMPCL के कर्मचारी बीते 1 जून से लगातार आंदोलन कर रहे हैं और अब उनका विरोध राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गया है।
जानकारी के अनुसार IMPCL कर्मचारियों का एक प्रतिनिधिमंडल दिल्ली पहुंच रहा है, जहां आज शेयर पर्चेजिंग एग्रीमेंट (SPA) पर हस्ताक्षर होने की संभावना जताई जा रही है। कर्मचारी इस प्रक्रिया को रोकने और अपनी मांगों को सरकार तक पहुंचाने के लिए आयुष मंत्रालय के अधिकारियों से मिलने का प्रयास करेंगे।
क्या है IMPCL?
IMPCL यानी इंडियन मेडिसिन फार्मास्युटिकल कॉरपोरेशन लिमिटेड की स्थापना देश में आयुर्वेद, यूनानी और अन्य भारतीय चिकित्सा पद्धतियों की दवाओं के निर्माण और आपूर्ति के उद्देश्य से की गई थी। उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में स्थित यह कंपनी वर्षों से सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों को आयुर्वेदिक दवाएं उपलब्ध कराती रही है।
कंपनी का विशेष महत्व इसलिए भी माना जाता है क्योंकि यह आयुष मंत्रालय के अधीन आने वाली उन चुनिंदा सरकारी कंपनियों में शामिल रही है, जो लगातार लाभ अर्जित कर रही थीं। कर्मचारियों का कहना है कि जब कंपनी घाटे में नहीं थी और नियमित रूप से लाभ कमा रही थी, तब उसके निजीकरण का निर्णय समझ से परे है।
कर्मचारियों का आरोप
आंदोलन कर रहे कर्मचारियों का कहना है कि IMPCL को उसकी वास्तविक संपत्तियों और संभावनाओं की तुलना में बेहद कम कीमत पर बेचा जा रहा है। उनका दावा है कि कंपनी के पास विशाल भूमि, भवन, उत्पादन इकाइयां, मशीनरी और वर्षों में अर्जित प्रतिष्ठा है, जिनका मूल्यांकन सही तरीके से नहीं किया गया।
कर्मचारी संगठनों का कहना है कि यदि किसी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम को निजी हाथों में सौंपना ही था, तो पहले व्यापक चर्चा होनी चाहिए थी। उनका आरोप है कि कर्मचारियों और स्थानीय लोगों को विश्वास में लिए बिना यह फैसला किया गया है।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह केवल एक कंपनी का मामला नहीं है, बल्कि देश की आयुर्वेदिक विरासत और सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्तियों से जुड़ा मुद्दा है। उनका मानना है कि यदि लाभ में चल रही कंपनियों को भी बेचा जाने लगेगा, तो सार्वजनिक क्षेत्र के भविष्य पर गंभीर प्रश्न खड़े होंगे।
1 जून से जारी है आंदोलन
IMPCL कर्मचारियों ने 1 जून से विरोध प्रदर्शन शुरू किया था। कर्मचारियों द्वारा धरना, प्रदर्शन और विभिन्न प्रकार के शांतिपूर्ण आंदोलन किए जा रहे हैं। उनका कहना है कि जब तक सरकार इस फैसले पर पुनर्विचार नहीं करती, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा।
कर्मचारी नेताओं का कहना है कि निजीकरण के बाद कर्मचारियों की नौकरी, सेवा शर्तों और भविष्य को लेकर भी गंभीर चिंताएं हैं। उन्हें आशंका है कि निजी प्रबंधन आने के बाद रोजगार सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
दिल्ली में बढ़ेगी हलचल
सूत्रों के अनुसार आज दिल्ली में शेयर पर्चेजिंग एग्रीमेंट (SPA) की प्रक्रिया पूरी होने की संभावना है। इसी को देखते हुए कर्मचारियों का एक प्रतिनिधिमंडल दिल्ली पहुंच रहा है। प्रतिनिधिमंडल आयुष मंत्रालय के अधिकारियों और संबंधित विभागों के समक्ष अपनी आपत्तियां दर्ज कराएगा।
कर्मचारियों की मांग है कि SPA पर हस्ताक्षर करने से पहले सभी पक्षों की बात सुनी जाए और कंपनी के मूल्यांकन तथा बिक्री प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच कराई जाए।
निजी कंपनी को मिलेगा संचालन
जानकारी के अनुसार कंपनी के संचालन का नियंत्रण अब निजी क्षेत्र
हाथों में जाने वाला है। कर्मचारियों और आंदोलनकारियों का दावा है कि कंपनी का संचालन उद्योगपति संजय गुप्ता से जुड़े समूह द्वारा किया जाएगा।
हालांकि सरकार की ओर से इस संबंध में जो भी आधिकारिक जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी, वही अंतिम रूप से मान्य होगी। फिलहाल कर्मचारियों के बीच इस बदलाव को लेकर असंतोष और चिंता का माहौल बना हुआ है।
स्थानीय अर्थव्यवस्था पर असर की आशंका
अल्मोड़ा और आसपास के क्षेत्रों में IMPCL केवल एक औद्योगिक इकाई नहीं बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा भी रही है। कंपनी से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिलता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि निजीकरण के बाद कंपनी की कार्यप्रणाली में बड़े बदलाव किए गए तो इसका असर क्षेत्र के रोजगार और आर्थिक गतिविधियों पर पड़ सकता है। यही कारण है कि कर्मचारियों के साथ-साथ कई सामाजिक संगठन भी इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं।
सरकार के सामने चुनौती
सरकार के लिए यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि आयुष क्षेत्र को बढ़ावा देने की दिशा में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे समय में आयुष मंत्रालय के अधीन लाभकारी कंपनी के निजीकरण को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब देना सरकार के लिए आवश्यक होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि निजीकरण से कंपनी की कार्यक्षमता बढ़ती है और उत्पादन में सुधार होता है, तो सरकार अपने फैसले का बचाव कर सकती है। वहीं दूसरी ओर कर्मचारी संगठन और विरोधी पक्ष कंपनी की बिक्री प्रक्रिया में पारदर्शिता और उचित मूल्यांकन की मांग कर रहे हैं।
निष्कर्ष
IMPCL का निजीकरण केवल एक कारोबारी सौदा नहीं बल्कि सार्वजनिक क्षेत्र, आयुर्वेदिक उद्योग और कर्मचारियों के भविष्य से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा बन गया है। एक ओर सरकार और निजी निवेशकों के दृष्टिकोण हैं, तो दूसरी ओर कर्मचारियों और स्थानीय लोगों की चिंताएं हैं। आने वाले दिनों में दिल्ली में होने वाली गतिविधियां और सरकार की प्रतिक्रिया इस पूरे विवाद की दिशा तय करेंगी। फिलहाल सभी की निगाहें आयुष मंत्रालय और IMPCL से जुड़े आगामी निर्णयों पर टिकी हुई हैं।
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नोट: यदि यह लेख समाचार वेबसाइट पर प्रकाशित करना है, तो निजीकरण और बिक्री से जुड़े दावों की आधिकारिक दस्तावेजों या सरकारी बयान से पुष्टि अवश्य कर लें।













