अंतर्राष्ट्रीय माहवारी स्वच्छता दिवस (28 मई) पर विशेष रिपोर्ट
ग्रामीण बदलाव की बयार: जागरूकता बढ़ी, लेकिन चुनौतियाँ अब भी कायम
माहवारी स्वच्छता को लेकर ग्रामीण परिवेश में आ रहा बदलाव
लखनऊ, 27 मई 2025
क्वीन मेरी अस्पताल द्वारा ग्रामीण एवं शहरी अविवाहित किशोरियों एवं युवतियों पर किए गए सर्वे में माहवारी स्वच्छता को लेकर दिलचस्प व चिंताजनक दोनों प्रकार के पहलू सामने आए हैं। रिपोर्ट दर्शाती है कि जहां एक ओर जागरूकता बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर सुविधाओं की कमी, सामाजिक व सांस्कृतिक रुकावटें और गलत धारणाएं अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।
यह सर्वे क्वीन मेरी अस्पताल की वरिष्ठ महिला रोग विशेषज्ञ एवं सेंटर ऑफ़ एक्सिलेंस फॉर एडोलसेंट हेल्थ की नोडल डॉ. सुजाता देव तथा काउंसलर सौम्या सिंह के दिशा निर्देशन में हुआ | इसको लेकर उन्होंने विस्तार से बताया कि “ सेंटर ऑफ़ एक्सिलेंस फॉर एडोलसेंट हेल्थ पर प्रदेश के विभिन्न जनपदों से आने वाली अविवाहित किशोरियों एवं युवतियों को इस सर्वे में शामिल किया गया |
सर्वे में सामने आया कि ग्रामीण क्षेत्र की किशोरियाँ अब मेंस्ट्रुअल कप जैसे पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों के बारे में जान रही हैं। यह बदलाव उम्मीद की किरण दिखाता है।“इसके अलावा “सैनिटरी पैड्स में प्लास्टिक व रसायन होते हैं। इन्हें जलाने से निकलने वाला धुआं न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है, बल्कि सांस की बीमारियों का कारण भी बन सकता है।
सर्वे में सहायक विशेषज्ञ डॉ. प्रतिभा कुमारी ने बताया कि माहवारी एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, इसे अशुद्ध मानना एक सामाजिक भ्रांति है, जिसे बदलने की ज़रूरत है। माहवारी स्वच्छता को लेकर सही जानकारी लोगों तक पहुंचाना बहुत जरूरी है क्योंकि स्वच्छता के अभाव में कई स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता हैं |
प्रमुख निष्कर्ष
• जानकारी की स्थिति:
47.5% किशोरियों को पहली माहवारी से पहले इसकी जानकारी थी, जबकि 52.5% को कोई जानकारी नहीं थी।
• उपयोग में आने वाले उत्पाद:
73% किशोरियाँ डिस्पोजेबल सैनिटरी पैड का उपयोग करती हैं। 21.5 % लड़कियां व युवतियाँ कपडे के कपड़े के पैड का इस्तेमाल करती हैं | सिर्फ 5.5% ही मेंस्ट्रुअल कप का प्रयोग करती हैं।
• स्वास्थ्य समस्याएं:
53% को रैशेज, खुजली और दाने की शिकायतें होती हैं, जिनमें से 37.5% ग्रामीण क्षेत्र से हैं।
• सुविधाओं की कमी:
44.5% के पास इस्तेमाल किए गए पैड के निस्तारण की उचित व्यवस्था नहीं है।
49.5% को ही साफ व निजी शौचालय उपलब्ध हैं।
• सांस्कृतिक पाबंदियाँ:
59.5% किशोरियाँ माहवारी के दौरान सामाजिक व धार्मिक प्रतिबंधों का सामना करती हैं।
उन्हें रसोई, पूजा या सामाजिक कार्यक्रमों से दूर रखा जाता है।
• शारीरिक स्वच्छता:
65.5% किशोरियाँ हर बार पैड बदलते समय जननांगों की सफाई करती हैं।
9% किशोरियाँ इसे कभी साफ नहीं करतीं।
57.5% केवल पानी का उपयोग करती हैं, 28% एंटीसेप्टिक और 14.5% साबुन-पानी का।
• उत्पादों की उपलब्धता व खर्च:
73% के लिए सैनिटरी उत्पाद उपलब्ध और सस्ते हैं, जबकि 27% को अब भी खरीदने में कठिनाई होती है।
• उत्पाद निस्तारण के तरीके:
72% पैड को कागज में लपेटकर फेंकती हैं।
8.5% इन्हें जला देती हैं, 14.5% ज़मीन में गाड़ती हैं और 5% स्कूल शौचालय में फ्लश कर देती हैं।
• माहवारी पर संवाद:
74% किशोरियाँ माहवारी पर खुलकर बात करती हैं, जबकि 19.5% इसे शर्म और संकोच से छुपा लेती हैं।
• पीरियड्स और शिक्षा/कार्य:
59% किशोरियाँ माहवारी के दौरान स्कूल या कार्यस्थल नहीं जातीं।
स्वच्छ व निजी टॉयलेट की अनुपलब्धता इसके पीछे बड़ी वजह है।
सुझाव व अनुशंसाएँ
1. माहवारी शिक्षा अनिवार्य हो:
स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए ताकि हर लड़की को वैज्ञानिक जानकारी मिले।
2. उपलब्धता व सुलभता:
सस्ते व टिकाऊ उत्पादों (जैसे मेंस्ट्रुअल कप) के प्रचार हेतु जागरूकता अभियान चलाए जाएं।
3. साफ-सुथरे टॉयलेट और डिस्पोजल सुविधाएं:
स्कूल, कार्यालय व सार्वजनिक स्थलों पर स्वच्छ शौचालय, पानी, डस्टबिन और इंसिनरेटर अनिवार्य हों।
4. सांस्कृतिक धारणाओं पर वार:
समुदायों में संवाद और वर्कशॉप हों, जिससे शर्म व संकोच की जगह वैज्ञानिक सोच स्थापित हो।
5. गरीबों को सहायता:
गरीब महिलाओं को मुफ्त या रियायती सैनिटरी उत्पाद उपलब्ध कराए जाएं।
6. पर्यावरण के अनुकूल निस्तारण:
उपयोग किए गए उत्पादों के लिए बायोडिग्रेडेबल विकल्प और सुरक्षित निस्तारण पर बल दिया जाए।












